गुरुवार, 23 जून 2011






बिनसर महादेव ,

यह बिनसर महादेव का मंदिर पट्टी - चौथान, ब्लाक थेलीसेंण जिला पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड का पर्सिध मंदिर है 
देव भूमि उत्तराखंड की अलोकिक धरती पर यह मंदिर स्वर्ग से कम नहीं है यहाँ की सुन्दरता मन को मोह लेती है यहाँ की धरती जो बनी है वह प्राकतिक छटा मन मे कुछ उदोलित कर देती है मन मे बड़ी आश थी की इस बार मेला ( कौथिग )देखने जाना है  जब हम छोटे - छोटे थे तो घर वाले हमे रात को मेला देखने नहीं जाने देते थे लेकिन जब हम बड़े हो गए तो जाने का प्रोग्राम बना यह का मेरा पहला अनुभव है क्योकि हमारा गाँव लगभग यहाँ से 12 कि० मीटर है गाँव का नाम है रिक्साल,   यह मेला हर वर्ष वेकुंड चतुर्दशी को लगता है        जी हाँ  लगभग हम 10 -  12  दोस्त शाम के टाइम 5 : 00  तेयार हो गए  क्योकि हमे रात 10 तक वह जाना था हम लोग जिस रास्ते से होकर जा रहे है उस रास्ते मे दो तीन गाँव पड़ते है तो हम रिक्सल से मंगरो मातोली से आगे गए रास्ते भर दिन  के मेला देखने वाले आ रहे थे क्योकि यहाँ पर लगभर तीनो जिलो के लोग आते है पौड़ी , चमोली , अल्मोड़ा  बिनसर का मेला तीन दिन चलता है 8: 00 बजे हम लोग देडा पहुचे मे आपको यह बता दू की देडा मे मेरी बुवा रहती है तो हमने सोचा की क्यों न यहाँ रात का डिनर कर ले आधे घंटे मे हमने खाना खाया और बिनसर की और निकल पड़े यहाँ से मुस्किल से घंटे भर का रास्ता है  रास्ते मे देवदार ,बाज , बुरास, चीड, रसाल, तिउज ये वृक्ष प्राय: 3000 मी० की उचाई पर मिलते है जेसे ही हम बिनसर पहुचे यहाँ मन को शांति मिल गयी की बिनसर पहुच गए जी  यहाँ मे पहली बार आ रहा था मुछे यहाँ की जानकर नहीं थी तो सबसे पहले गेट न० - 3  से गए है यहाँ देखा तो यहाँ की रंगीली आजीब थी  जो मेरा पिता जी व् माँ  कहा करते थी वही है देखा तो यहाँ लोगो की भीड़  ही  उमड़ी थी यहाँ पर अपनी गढ़वाली निर्त्य पांडव नृत्य जो गढ़वाल; मे प्रसिद्ध  है      चौफला , झुमेला, भोऊ सरेला  यह हमने सुनी थी देखि नहीं थी लेकिन आज यह सब मेरे समने हो रहा था 
      यहाँ पर एसा लग रहा था की पूरा रामनगर कोटद्वार बाज़ार यही लगा है कही अल्मोड़ा की बलुसाई कही कोटद्वार की बर्फी मौसो ( वीर चंदर सिंह गढ़वाली का जन्म स्थान ) माल्टा कही कफ्ल्गैर ( नागचूला ) का नारगी   हर तरह से स्थानीय लोगो  का स्टोल लगे थे  फिर मैं ने अपने बड़े भाई पदम् से कहा की यहाँ सब ये कैसे आये जी

भोऊ सरेला का एक अंश .................... ओ भो ओ ओ ................................................ इस प्रकार से राठी गा रहे थे कुछ कुमौनी एक जगह पर झोडा (कुमौनी  गीत ) गा रहे थे ( मे सम्भवत: पौड़ी जिला का लास्ट गाँव का हूँ  इसलिए मे गढ़वाली, कुमौनी, राठी, सल्यानी, व् लुभ्याई ( गैरसेंण का क्षेत्र ) को आशनी से समझ व् बोल लेता हूँ    कही पर डौरा -  थकुली कही पर ढोल -  दमोऊ आदि बाध्य यंत्रो से बिनसर का वातावरण गुंजायमान हो रहा था











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